जल-जंगल-जमीन-जैव विविधता पर संकट:ग्रामसभा अधिकारों के दमन और खनन परियोजनाओं के खिलाफ आज 16 जनवरी को अंबिकापुर में विशाल रैली

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जल–जंगल–जमीन–जैव विविधता पर संकट: ग्रामसभा अधिकारों के दमन और खनन परियोजनाओं के ख़िलाफ़ 16 जनवरी को अंबिकापुर में विशाल रैली


अंबिकापुर (सरगुजा)।
छत्तीसगढ़ में जल, जंगल, जमीन, जैव विविधता और पर्यावरण के तेज़ी से हो रहे विनाश के ख़िलाफ़ जन आंदोलनों ने एकजुट होकर निर्णायक संघर्ष का ऐलान किया है। ग्रामसभाओं के संवैधानिक अधिकारों को दरकिनार कर खनन परियोजनाओं को आगे बढ़ाए जाने, आदिवासी समुदायों के विस्थापन और पर्यावरणीय तबाही के विरोध में 16 जनवरी 2026 को बी.टी.आई. ग्राउंड, अंबिकापुर में सुबह 11 बजे से विशाल रैली एवं आमसभा आयोजित की जाएगी।


इस आयोजन का आह्वान हसदेव बचाओ संघर्ष समिति, सरगुजा के संयोजन में किया गया है।


पीढ़ियों से चला आ रहा जीवन संकट में
आंदोलनकारियों का कहना है कि जल–जंगल–जमीन पर आधारित आदिवासी और ग्रामीण समाज की आजीविका पीढ़ियों से चली आ रही है, जिसे खनन परियोजनाओं के नाम पर जबरन छीना जा रहा है। विस्थापन के कारण न केवल आजीविका पर संकट है, बल्कि संस्कृति, सामाजिक संरचना और परंपराएं भी नष्ट हो रही हैं। स्थानीय समुदायों की सहमति के बिना परियोजनाएं थोपे जाने से सामाजिक टकराव बढ़ रहा है।


सरगुजा संभाग पर मंडराता खनन संकट
सरगुजा संभाग के हसदेव, मैनपाट, सामरी पाट, ओड़गी, भैयाथान, सुरसा, वाड्रफनगर, चलगली, तातापानी, आमगांव, अमेरा, प्रेमनगर, मदननगर सहित कई क्षेत्रों में प्रस्तावित और प्रक्रियाधीन खनन परियोजनाओं से गंभीर पर्यावरणीय संकट खड़ा हो गया है।
कोरिया से रायगढ़ तक 50 से अधिक कोयला, बॉक्साइट, लिथियम और ग्रेफाइट खनन परियोजनाएं प्रस्तावित बताई जा रही हैं, जिनसे लाखों हेक्टेयर जंगल भूमि के विनाश की आशंका है।


नदियां सूख रहीं, जैव विविधता विलुप्ति की कगार पर
खनन गतिविधियों के कारण छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी नदियों के जलस्रोत प्रभावित हो रहे हैं। जंगलों के कटाव से भू-जल स्तर गिर रहा है और वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है। आंदोलनकारियों के अनुसार जैव विविधता और वन्यजीव विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुके हैं।


प्रदूषण के दुष्प्रभाव से आमजन गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा है, वहीं जलवायु परिवर्तन के प्रभाव—तापमान वृद्धि, भीषण तूफान, बाढ़, सूखा, असमय वर्षा और अकाल—लगातार बढ़ रहे हैं।


कोयला धूल से कैंसर तक का खतरा
हाल ही में संसद के लोकसभा सत्र में प्रस्तुत एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए आंदोलनकारियों ने कहा कि कोयले की धूल से फेफड़ों को गंभीर क्षति और कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। जंगलों के विनाश का असर केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि महानदी, गोदावरी और गंगा बेसिन क्षेत्रों में भी गंभीर जल संकट पैदा होने की आशंका है। रिपोर्टों में लगभग 12 नदियों के जल प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव की चेतावनी दी गई है।


हसदेव अरण्य: ‘छत्तीसगढ़ का फेफड़ा’ खतरे में
हसदेव अरण्य, जिसे छत्तीसगढ़ का फेफड़ा कहा जाता है, वहां खनन से मिनीमाता हसदेव बांगो बांध के अस्तित्व पर भी संकट बताया जा रहा है। मानव–हाथी संघर्ष तेज़ हुआ है और अब तक सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है।


केंद्र सरकार की संस्था भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने चेतावनी दी है कि हसदेव में खनन की अनुमति से मानव–हाथी संघर्ष असंयंत्रित हो सकता है और एलिफेंट कॉरिडोर बुरी तरह प्रभावित होगा।


रामगढ़ पहाड़ और सीता भेंगरा पर भी खतरा
छत्तीसगढ़ के प्राचीन धार्मिक–सांस्कृतिक स्थल रामगढ़ पहाड़ पर भी संकट गहराता जा रहा है। हसदेव अरण्य क्षेत्र की खदानों में हो रहे विस्फोटों से पहाड़ में दरारें पड़ने की बात कही जा रही है।


नई केतें एक्सटेंशन कोयला परियोजना में लगभग 6 लाख पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है, जिससे रामगढ़ पहाड़ और प्राचीन नाट्यशाला सीता भेंगरा के अस्तित्व पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।


कानूनों का उल्लंघन और ग्रामसभा की अनदेखी
आंदोलनकारियों का आरोप है कि राज्य सरकार एक ओर आदिवासी अधिकारों की बात करती है, वहीं दूसरी ओर बड़े पूंजीपतियों के हित में पेसा कानून, वनाधिकार मान्यता कानून और भूमि अधिग्रहण कानून का उल्लंघन किया जा रहा है।


हसदेव अरण्य में आदिवासी समुदाय तीन वर्षों तक धरने पर बैठे रहे, लेकिन कथित तौर पर फर्जी ग्रामसभाओं के जरिए कंपनियों को वन एवं पर्यावरणीय स्वीकृतियां दी गईं।
छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग की जांच रिपोर्ट में साल्ही, हरिहरपुर, फतेहपुर और घाटबर्रा गांवों के ग्रामसभा प्रस्तावों को फर्जी और कूटरचित पाया गया, इसके बावजूद पेड़ों की कटाई जारी रहने का आरोप है।


राज्यभर में तेज़ हो रहा विरोध
अमेरा खदान से प्रभावित परसोड़ीकलां गांव की ग्रामसभा 2014 से खनन के विरोध में प्रस्ताव पारित कर रही है, फिर भी भूमि अधिग्रहण किया गया।
रायगढ़ के तमनार क्षेत्र में जिंदल की गारे पेलमा परियोजना, अंबुजा (अदानी) की कोयला खदानें और श्री सीमेंट की छुईखदान लाइमस्टोन परियोजना सहित कई स्थानों पर ग्रामीणों द्वारा पर्यावरणीय जनसुनवाई के खिलाफ आंदोलन जारी है।


“आने वाली पीढ़ियों के लिए भी नहीं बचेगा छत्तीसगढ़”
आंदोलनकारियों का कहना है कि सरगुजा से बस्तर और रायगढ़ से खैरागढ़ तक बॉक्साइट, कोयला, आयरन ओर, लाइमस्टोन, गोल्ड, लिथियम और ग्रेफाइट खनन के कारण जल, जंगल, जमीन, पहाड़ और नदियों का अभूतपूर्व विनाश हो रहा है। यदि समय रहते इसे नहीं रोका गया, तो छत्तीसगढ़ आने वाली पीढ़ियों के रहने योग्य भी नहीं बचेगा।


16 जनवरी को निर्णायक जनआंदोलन
इन्हीं मुद्दों को लेकर 16 जनवरी 2026 को अंबिकापुर में आयोजित विशाल रैली और आमसभा को निर्णायक मोड़ देने की तैयारी है। आयोजकों ने सरगुजा और पूरे छत्तीसगढ़ के नागरिकों, आदिवासी–ग्रामीण समुदायों, पर्यावरण प्रेमियों और जन संगठनों से बड़ी संख्या में शामिल होकर संघर्ष को मजबूत करने की अपील की है।

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