छत्तीसगढ़ के ग्रामीणों ने रचा इतिहास: दशरथ मांझी की तरह पहाड़ काटकर बनाया गांव के लिए नया रास्ता

Pendra News V Jpg 442x260 3g610583686057180813



छत्तीसगढ़ के ग्रामीणों ने रचा इतिहास: दशरथ मांझी की तरह पहाड़ काटकर बनाया गांव के लिए नया रास्ता

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (छत्तीसगढ़), 17 सितम्बर 2025:
छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के जोड़ातालाब पंचायत के घोघाड़बरा गांव के लोगों ने अपनी मेहनत और ज़िद के दम पर वह कर दिखाया जो कई बार प्रशासन और सरकारें नहीं कर पातीं। गांव के 30 से 40 ग्रामीणों ने मिलकर सिर्फ हथौड़े और कुदाल के सहारे एक पहाड़ काटकर ऐसा रास्ता तैयार किया, जिससे अब एम्बुलेंस, स्कूल बस और कृषि वाहन गांव तक आसानी से पहुँच सकेंगे।

एक पगडंडी बंद हुई और शुरू हुआ संघर्ष

घटना की शुरुआत तब हुई जब वन विभाग ने गांव के पास प्लांटेशन कराते हुए पुराने पगडंडी रास्ते को पूरी तरह बंद कर दिया। यह वही रास्ता था जिससे वर्षों से गांव के लोग आना-जाना करते थे और एम्बुलेंस, स्कूली वाहन, कृषि ट्रैक्टर भी गाँव तक पहुँचते थे। विकल्प स्वरूप विभाग ने एक ऊँचाई पर बेहद संकरी और कच्ची सड़क बना दी, जो न तो सुरक्षित थी और न ही व्यावहारिक।

बचपन की मौत और दर्दनाक असहायता

कुछ दिन पहले गांव की एक बच्ची बीमार पड़ी और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। जब एम्बुलेंस शव को लेकर गांव वापस आ रही थी, तो वह पहाड़ी रास्ते में फंस गई। हालात इतने बिगड़े कि एम्बुलेंस चालक ने शव को गांव तक ले जाने से इनकार कर दिया। इस हृदयविदारक घटना ने पूरे गांव को झकझोर दिया।

यही वह क्षण था जब ग्रामीणों ने तय कर लिया कि अब और इंतजार नहीं, अब वे खुद रास्ता बनाएंगे।

हथौड़े और कुदाल से बदला गांव का नसीब

गांव के लगभग 30-40 लोगों ने बिना किसी सरकारी सहायता के हाथ में हथौड़े, कुदाल, फावड़े उठाए और दिन-रात मेहनत कर चट्टानों को तोड़कर रास्ता बनाना शुरू कर दिया। इस मेहनत में केवल पुरुष ही नहीं, महिलाएं, बच्चे, बूढ़े – सभी ने बराबर का योगदान दिया। पत्थर हटाए गए, मिट्टी समतल की गई, और कुछ ही दिनों में एक ऐसा रास्ता तैयार हो गया जिससे अब वाहनों का आना-जाना सुचारू रूप से संभव हो गया

“क्या हम हाईवे बनाकर दें?” – विभाग का जवाब

जब ग्रामीणों ने पहले रास्ता बनाने के लिए वन विभाग से गुहार लगाई, तो उन्हें कथित तौर पर यह जवाब मिला – “क्या हम हाईवे बनाकर दें?” इस उपेक्षा भरे रवैये के बाद ग्रामीणों ने तय कर लिया कि अब वे किसी भी मदद की उम्मीद नहीं करेंगे और अपनी ताकत पर ही भरोसा रखेंगे।

आज भी विकास की मार झेलते हैं गांव

यह घटना भारत के उन अनगिनत गांवों की कहानी है जहाँ विकास की योजनाएँ कागज़ों पर तो दिखती हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत बहुत अलग होती है। सरकारी विभागों की लापरवाही, असंवेदनशीलता और संसाधनों की कमी के कारण आज भी कई गांवों के लोग मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं।

घोघाड़बरा गांव में अभी भी स्कूल बस नहीं पहुँचती, बच्चों को कई किलोमीटर पैदल जाना पड़ता है। पहाड़ी रास्ते पर रोज़ कोई न कोई गिरकर घायल होता है। मरीज़ों को पीठ पर उठाकर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है।

एकता और श्रमदान की मिसाल

इस गांव की कहानी सिर्फ संघर्ष की नहीं, बल्कि एकता और सामूहिक श्रमदान की मिसाल है। ग्रामीणों की इस पहल को देखकर कहा जा सकता है कि भारत की असली ताकत उसके गांवों में बसती है, जहाँ लोग सरकार का इंतजार नहीं करते, बल्कि खुद अपनी तक़दीर लिखते हैं।




क्या कहते हैं ग्रामीण?

ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें ना तो वन विभाग से मदद मिली, ना ही पंचायत या जिला प्रशासन से कोई हाथ बढ़ाया गया। वे चाहते हैं कि सरकार अब उनकी मेहनत को देखकर स्थायी सड़क बनाए, ताकि भविष्य में ऐसी कोई त्रासदी फिर न हो।




समापन: विकास सिर्फ शहरी नहीं, ग्रामीण भी हो

यह घटना एक कड़ा सवाल उठाती है – क्या विकास सिर्फ शहरों के लिए है? क्या ग्रामीण भारत की आवाज़ इतनी कमजोर है कि उसे सिर्फ हादसों के बाद ही सुना जाता है?

जबतक गांवों तक बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुँचेंगी, तब तक ‘विकास’ एक अधूरा सपना ही रहेगा।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *