प्रदेश में धान खरीदी में अव्यवस्था, टोकन व्यवस्था सवालो के घेरे में, किसान परेसान,टोकन व्यवस्था की नाकामी — तकनीकी खामियां या प्रशासनिक लापरवाही?

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**धान खरीदी में टोकन व्यवस्था बार-बार क्यों फेल हो रही है?

किसान अपमान और त्रासदी झेलने को क्यों मजबूर?**

प्रदेश में धान खरीदी का मौसम शुरू होते ही एक बार फिर टोकन व्यवस्था सवालों के घेरे में है। किसानों को समय पर टोकन नहीं मिल रहा, सर्वर बार-बार ठप पड़ रहा है और खरीदी केंद्रों में अव्यवस्था का आलम बना हुआ है। प्रशासन दावा करता है कि टोकन सिस्टम पारदर्शिता और सुविधा के लिए बनाया गया है, लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट है।

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टोकन व्यवस्था की नाकामी — तकनीकी खामियां या प्रशासनिक लापरवाही?

कई खरीदी केंद्रों पर किसान सुबह-शाम लाइन में खड़े रहते हैं, लेकिन

पोर्टल खुलते ही हैंग हो जाता है

टोकन जारी होने में घंटों लगते हैं

दलालों द्वारा टोकन की कालाबाज़ारी की शिकायतें

केंद्रों पर पर्याप्त कर्मचारियों और संसाधनों की कमी


किसानों का आरोप है कि यह व्यवस्था ‘कागज़ों में सुविधाजनक’ है लेकिन ‘जमीन पर त्रासदी’ बन गई है।

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किसान को अपनी ही फसल बेचने के लिए अपमान क्यों सहना पड़ रहा है?

धान बेचने के लिए किसान महीनों मेहनत करता है, कर्ज लेता है, लेकिन खरीदी केंद्रों पर उसकी सुनवाई नहीं होती।
कहीं तौल मशीनें खराब रहती हैं, कहीं बारदाना उपलब्ध नहीं, तो कहीं अधिकारी समय पर नहीं पहुंचते।

कुछ किसानों का कहना है कि केंद्रों पर तैनात कर्मियों का रवैया भी असंवेदनशील रहता है।
“फसल हमारी, मेहनत हमारी… लेकिन बेइज्जती भी हमारी ही क्यूं?”—किसानों का यह दर्द हर जिले से सुनाई दे रहा है।

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क्या खरीदी केंद्रों की निगरानी सिर्फ कागज़ों में हो रही है?

कागज़ों में तो हर केंद्र पर

जिम्मेदार अधिकारी

दैनिक निरीक्षण

पारदर्शी प्रक्रिया

किसानों के लिए शिकायत निवारण व्यवस्था
जैसी सुविधाएँ दर्ज हैं।

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लेकिन किसानों का कहना है कि इन दावों की सच्चाई कागज़ों से बाहर कभी दिखाई ही नहीं देती।
जब भी कोई घटना होती है, प्रशासन जागता है, जांच का आश्वासन दिया जाता है, और मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला जाता है।




किसान आत्महत्या को मजबूर हो जाए, इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा?

खरीदी में देरी, कर्ज का बोझ, लागत का बढ़ना और फसल बेचने की अनिश्चितता—इन सबके बीच किसान मानसिक दबाव में जी रहा है।
अगर किसान हालात से टूटकर आत्महत्या जैसा कदम उठाता है, तो सिर्फ उसी को दोषी मानना अन्याय होगा।

किसानों का सवाल है—
“जब पूरी व्यवस्था हमें जीने नहीं देती, तो हमारी मौत का जिम्मेदार किसे माना जाए?”




मनबोध गाड़ा अस्पताल में भर्ती – प्रशासन सक्रिय होने की कोशिश में।

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ताज़ा मामले में किसान मनबोध गाड़ा की तबीयत बिगड़ने के बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
परिवार का आरोप है कि लगातार धान खरीदी की परेशानी और मानसिक तनाव ने उसे इस स्थिति तक पहुंचा दिया।

अस्पताल में उसका इलाज जारी है।
दूसरी ओर, प्रशासनिक अधिकारी खरीदी केंद्र की कार्यप्रणाली की जांच का आश्वासन दे रहे हैं।

लेकिन किसानों के मन में बड़ा सवाल यह है—
“क्या जांच से टूटी हुई उम्मीदें लौट आएंगी?”
क्या इससे आने वाले दिनों में किसान सम्मान और सुविधा के साथ अपनी फसल बेच पाएंगे?




किसानों की मांग – व्यवस्था ठीक करो, वादे नहीं

टोकन सिस्टम को पारदर्शी और तकनीकी रूप से मजबूत बनाया जाए

खरीदी केंद्रों पर वास्तविक निगरानी हो

दलालों पर सख्त कार्रवाई

बारदाना, तौल मशीन और स्टाफ की पर्याप्त व्यवस्था

किसानों के लिए हेल्पलाइन और शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई


किसान सिर्फ इतना चाहते हैं कि उन्हें अपनी ही फसल बेचने के लिए अपमान, निराशा और त्रासदी से न गुजरना पड़े।

किसानो का सम्मान करो,किसान है तो सब है किसान नहीं तो कुछ नहीं,

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