मुख्यमंत्री के गृह जिले जशपुर से उठी लोकतंत्र की चीख :पत्रकारों को डराने धमकाने की साजिश पर चुप क्यों हैं मुख्यमंत्री और जनसम्पर्क आयुक्त?

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मुख्यमंत्री के गृह जिले जशपुर से उठी लोकतंत्र की चीख: पत्रकारों को डराने की साजिश पर चुप क्यों हैं मुख्यमंत्री और जनसंपर्क आयुक्त?




📍 जशपुरनगर, छत्तीसगढ़ | विशेष रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले से एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने न केवल पत्रकारिता जगत को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी परंपराओं पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के गृह जिले जशपुर में पत्रकारों को डराने, धमकाने और उनकी आवाज़ दबाने की साजिश के आरोपों ने प्रदेश की राजनीति और शासन-प्रशासन को कठघरे में खड़ा कर दिया है।




💥 क्या है पूरा मामला?

जशपुर जनसंपर्क विभाग की सहायक संचालक नूतन सिदार पर आरोप है कि उन्होंने विभाग के ही एक कर्मचारी रविंद्र कुमार की शिकायत को आधार बनाकर जिले के कई पत्रकारों को 1-1 करोड़ रुपये के मानहानि नोटिस थमा दिए। आरोप है कि यह नोटिस केवल एक औपचारिक कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि पत्रकारों को डराने और दबाने की योजना का हिस्सा था।

सूत्रों के अनुसार, कुछ पत्रकारों को फोन पर यह धमकी तक दी गई कि उन्हें “आत्महत्या के लिए उकसाने” के आरोप में फँसाया जाएगा। यह घटना अब कानून और लोकतंत्र दोनों के लिए गहरी चिंता का विषय बन गई है।




🛑 प्रशासनिक चुप्पी या मौन स्वीकृति?

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान, जशपुर के कलेक्टर रोहित व्यास और जिला पुलिस प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि जिस शासकीय व्हाट्सएप ग्रुप में पत्रकारों को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया, उसमें कलेक्टर भी सदस्य थे। लेकिन उन्होंने न तो कोई हस्तक्षेप किया, न ही आपत्तिजनक गतिविधियों पर कार्रवाई की।

यह चुप्पी “मौन सहमति” मानी जा रही है। प्रशासनिक अधिकारियों की निष्क्रियता ने इस मामले को और अधिक गंभीर बना दिया है।




🔥 जनसंपर्क विभाग बना ‘जन विरोधी विभाग’?

जनसंपर्क विभाग सीधे मुख्यमंत्री के अधीन आता है। वर्तमान जनसंपर्क आयुक्त, जो खुद पूर्व में जशपुर के कलेक्टर रह चुके हैं, इस पूरे मामले से अनजान नहीं हो सकते। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है:

क्या आयुक्त को जशपुर के हालात की जानकारी नहीं है?

अगर है, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

अगर जानकारी नहीं है, तो क्या विभाग बेकाबू हो गया है?


जनता, पत्रकार और समाज के बौद्धिक वर्गों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या इस पूरे प्रकरण को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है?




🤐 मुख्यमंत्री की चुप्पी पर उठते सवाल

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की अब तक की चुप्पी सबसे बड़ा राजनीतिक और नैतिक सवाल बन गई है। जब मामला उनके गृह जिले का है, और विभाग उनके प्रत्यक्ष नियंत्रण में है, तो इस पर अब तक कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं आई?

क्या यह मान लिया जाए कि यह चुप्पी अप्रत्यक्ष संरक्षण का संकेत है?




⚠️ लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी

पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानी जाती है। जब सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल कर पत्रकारों को धमकाया जाए, उन्हें आत्महत्या के केस में फँसाने की धमकी दी जाए, और करोड़ों के मानहानि नोटिस भेजे जाएं, तो यह लोकतंत्र पर सीधा हमला है।

यह सिर्फ जशपुर की समस्या नहीं है, यह पूरे छत्तीसगढ़ की प्रेस स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संकट है।




✊ संयुक्त पत्रकार संघ का ऐलान: 10 सितंबर को जशपुर में होगा बड़ा आंदोलन

घटना के विरोध में संयुक्त पत्रकार संघ ने बड़ा ऐलान करते हुए कहा है कि 10 सितंबर 2025 (बुधवार) को प्रदेशभर के पत्रकार जशपुरनगर में एकत्रित होंगे। यह आंदोलन सिर्फ पत्रकारों के हक की लड़ाई नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का अभियान होगा।

पत्रकार संघ ने यह भी स्पष्ट किया है कि:

अगर प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई नहीं की,

अगर नूतन सिदार पर निष्पक्ष जांच नहीं बैठाई गई,

और अगर शासन पत्रकारों को सुरक्षा नहीं देता,


तो यह आंदोलन प्रदेशव्यापी संघर्ष का रूप लेगा।




🗣️ पत्रकारों की एकजुट आवाज़

पत्रकारों का कहना है कि—

> “अब यह लड़ाई केवल किसी एक पत्रकार की नहीं रही, बल्कि पूरे पत्रकारिता समुदाय की अस्मिता और सुरक्षा का सवाल बन चुकी है। यह हमारी कलम की आज़ादी का संघर्ष है।”






📢 जनता की ओर से उठते सवाल

क्या लोकतंत्र में पत्रकारों को सवाल पूछने की इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी?

क्या छत्तीसगढ़ में अब सच लिखने वालों को चुप कराने का नया ट्रेंड शुरू हो गया है?

क्या शासन की चुप्पी ही अब भय फैलाने का सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है?





🔍 निष्कर्ष: अब निर्णय की घड़ी

जशपुर की घटना महज़ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है। अगर सरकार अब भी चुप बैठी रही, तो यह इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज होगा। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और जनसंपर्क आयुक्त को इस पूरे मामले पर स्पष्ट, पारदर्शी और निष्पक्ष कार्रवाई करनी होगी।

वरना यह माना जाएगा कि यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि सत्ता की तानाशाही है – जहाँ कलम को तोड़ने के लिए सरकारी मोहर का इस्तेमाल किया जाता है।




🖊️ लेखक: तिल्दा टाइम्स CG न्यूज संवाददाता
📅 प्रकाशन तिथि: 07 सितंबर 2025
📌 स्थान: जशपुरनगर, छत्तीसगढ़




📣 संघर्ष जारी है… लोकतंत्र की आवाज़ दबेगी नहीं।
📍 #पत्रकार_पर_हमला #जशपुर_की_चुप्पी #

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