रायपुर: नाम से मिलने वाली पीड़ा का अंत — छत्तीसगढ़ के 12 गांवों को मिलेगी नई पहचान

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रायपुर: नाम से मिलने वाली पीड़ा का अंत — छत्तीसगढ़ के 12 गांवों को मिलेगी नई पहचान


छत्तीसगढ़ में जातिसूचक, अपमानजनक और अजीब नामों वाले गांवों और मोहल्लों के नाम बदलने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के संज्ञान लेने और राज्य शासन से रिपोर्ट मांगे जाने के बाद यह कदम उठाया गया है।


प्रमुख बिंदु:
उद्देश्य: जातिगत आधार पर रखे गए नाम जो अपमानजनक लगते हैं या जिनसे शर्मिंदगी महसूस होती है, उन्हें बदलकर सम्मानजनक नाम दिए जाएंगे।

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बदलाव की पहल: छत्तीसगढ़ सरकार ने स्थानीय भावनाओं और सांस्कृतिक पहचान को ध्यान में रखते हुए कई गांवों के नाम बदलने का फैसला किया है।


उदाहरण:
कबीरधाम जिले के चंडालपुर का नाम बदलकर चंदनपुर कर दिया गया है।


जशपुर जिले के चुड़ैलझरिया का नाम बदलकर सुंदरझरिया करने की मांग पर काम चल रहा है।


गाढ़ाभाठा (कवर्धा) का नाम बदलकर सोनपुर किया गया है।

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यह कार्रवाई राज्य में सामाजिक समानता और सम्मानजनक पहचान स्थापित करने के लिए की जा रही है।

क्या किसी गांव का नाम किसी की मानसिक पीड़ा, सामाजिक अपमान और भेदभाव का कारण बन सकता है?
छत्तीसगढ़ सरकार और राष्ट्रीय आयोगों की पहल ने इस सवाल का स्पष्ट उत्तर दिया है—हाँ।


इसी सोच के साथ प्रदेश के 12 गांवों और टोलों के अपमानजनक नाम बदलने की ऐतिहासिक प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।


बरसों से जातिसूचक, अंधविश्वास से जुड़े और सामाजिक दंश पैदा करने वाले नामों के साथ जी रहे इन गांवों के लिए अब एक नई, गरिमामय और सम्मानजनक पहचान तय की जा रही है।

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क्यों जरूरी हुआ गांवों के नाम बदलना?
छत्तीसगढ़ के कई जिलों में ऐसे गांव और बस्तियां थीं, जिनके नाम नकटी, भंगी बस्ती, चमारपारा, डोमटोला, टोनहीनारा, चुड़ैलझरिया जैसे शब्दों से जुड़े थे।


ये नाम—
जाति आधारित अपमान को बढ़ावा देते थे
अंधविश्वास और सामाजिक कलंक को मजबूत करते थे
वहां रहने वाले नागरिकों को रोज़मर्रा के जीवन में मानसिक आघात देते थे


ग्रामीणों का कहना था कि दूसरे क्षेत्रों में अपनी पहचान बताने में शर्मिंदगी, बच्चों को स्कूलों में ताने, और रोजगार के समय भेदभाव जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ता था।


मानसिक पीड़ा और सामाजिक भेदभाव की सच्चाई
इन गांवों के लोग सिर्फ आर्थिक या भौगोलिक पिछड़ेपन से नहीं, बल्कि नाम से जुड़ी सामाजिक हीनता से जूझ रहे थे।
एक ग्रामीण के अनुसार,
“जब हम अपना पता बताते थे, तो लोग पहले हँसते थे, फिर सवाल करते थे। बच्चों के मन पर इसका गहरा असर पड़ता था।”

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विशेषज्ञ मानते हैं कि स्थान का नाम व्यक्ति की सामाजिक पहचान का अहम हिस्सा होता है, और जब वही नाम अपमानजनक हो, तो यह आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुंचाता है।


आयोगों की सख्ती के बाद आई निर्णायक पहल
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और अनुसूचित जनजाति आयोग ने इस मुद्दे को गंभीर मानवाधिकार और सामाजिक न्याय का प्रश्न माना।


आयोगों के कड़े निर्देशों और लगातार पत्राचार के बाद राज्य सरकार ने इन नामों को बदलने की प्रक्रिया को औपचारिक रूप से शुरू किया।


अनुसूचित जनजाति आयोग के सचिव इफ्तखार अली ने कहा—
“ये नाम सिर्फ शब्द नहीं थे, बल्कि एक पूरे वर्ग के प्रति सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव का प्रतीक बन चुके थे। इन्हें बदलना सम्मान और समानता की दिशा में जरूरी कदम है।”


इन जिलों में बदले जाएंगे गांवों के नाम
राज्य सरकार द्वारा जिलों से प्रस्तावित सूची मंगाई गई है, जिन्हें जल्द ही राजपत्र (Gazette Notification) में प्रकाशित किया जाएगा।


वर्तमान अपमानजनक नाम (जो बदले जाएंगे)
क्षेत्र / जिला –
रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर -नकटी ,सुवरतला ,कोलिहा


महासमुंद, जांजगीर-चांपा – भंगी बस्ती, प्रेतनडीह

बालोद, कवर्धा -चंडालपुर, डौकीडीह ,बोक्करखार

रायगढ़ – टोनहीनारा

बस्तर, कांकेर – चूहड़ा टोला

सरगुजा, जयपुर – डोमपारा, डोमटोला, चुड़ैलझरिया

कैसे तय होंगे नए नाम?

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जिला स्तर पर प्रशासन, पंचायत और स्थानीय जनप्रतिनिधियों से सुझाव एवं प्रस्ताव लिए जा रहे हैं
नाम स्थानीय संस्कृति, भूगोल, इतिहास और सकारात्मक पहचान को दर्शाने वाले होंगे।


प्रक्रिया पूरी होने के बाद नामों को आधिकारिक रिकॉर्ड, राजस्व दस्तावेज़ और मानचित्रों में बदला जाएगा
नया नाम, नया सवेरा
यह बदलाव केवल कागजी नहीं है।


यह उन हजारों लोगों के आत्मविश्वास, सम्मान और सामाजिक बराबरी से जुड़ा है, जो वर्षों से अपने गांव के नाम के कारण खुद को छोटा महसूस करते थे।


अब टोनहीनारा, डोमटोला, भंगी बस्ती जैसे शब्द इतिहास बनेंगे—
और उनकी जगह ऐसे नाम लेंगे, जिनसे पहचान पर गर्व हो, शर्म नहीं।


छत्तीसगढ़ की यह पहल बताती है कि
सामाजिक न्याय केवल योजनाओं से नहीं, भाषा और पहचान से भी जुड़ा होता है।

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