
तमनार : ‘जनमत’ का दमन या ‘विकास’ का भ्रम?
PESA कानून की कसौटी पर लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा
रायगढ़।
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के तमनार विकासखंड से सामने आ रही घटनाएं एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर रही हैं कि क्या अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की संवैधानिक शक्तियां केवल कागज़ों तक सीमित रह गई हैं? गारे पेलमा सेक्टर–1 को लेकर 14 गांवों के ग्रामीणों का विरोध, कथित “फर्जी जनसुनवाई” और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा समर्थन वीडियो—ये सभी घटनाक्रम मिलकर प्रशासनिक पारदर्शिता, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और PESA कानून (1996) के वास्तविक पालन पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।

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ग्राम सभा की सहमति : संवैधानिक अधिकार या औपचारिकता?
भारतीय संविधान की पाँचवीं अनुसूची और PESA कानून स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करते हैं कि अनुसूचित क्षेत्रों में किसी भी खनन अथवा विकास परियोजना से पहले संबंधित ग्राम सभाओं की पूर्व, स्वतंत्र और सूचित सहमति अनिवार्य है।
लेकिन तमनार के ग्रामीणों का आरोप है कि इस संवैधानिक प्रावधान को दरकिनार करते हुए गारे पेलमा सेक्टर–1 की जनसुनवाई को महज एक औपचारिकता में बदल दिया गया।
ग्रामीणों द्वारा लगाए गए पोस्टरों और बयानों के अनुसार, 08 दिसंबर 2025 को आयोजित जनसुनवाई को पूर्व निर्धारित स्थल से हटाकर किसी अन्य स्थान पर आयोजित किया गया, जिससे बड़ी संख्या में प्रभावित ग्रामीण उसमें भाग ही नहीं ले सके। ग्रामीण इसे “तकनीकी बदलाव” नहीं, बल्कि “सहमति को कमजोर करने की साजिश” बता रहे हैं।

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14 गांवों का विरोध : फिर जनसुनवाई कैसे सफल?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब 14 गांवों के ग्रामीण खुलकर इस परियोजना और जनसुनवाई की प्रक्रिया का विरोध कर रहे हैं, तब प्रशासन ने जनसुनवाई को “सफल” कैसे घोषित कर दिया?
ग्रामीणों की मांग है कि—
इस पूरी प्रक्रिया की न्यायिक जांच कराई जाए
कथित रूप से गलत तरीके से जनसुनवाई कराने वाले अधिकारियों और कंपनी प्रतिनिधियों पर FIR दर्ज हो
विरोध करने वाले ग्रामीणों पर दर्ज मुकदमों को वापस लिया जाए
इन मांगों ने प्रशासन की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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वायरल समर्थन वीडियो : स्वाभाविक राय या रटी-रटाई स्क्रिप्ट?
विरोध के बीच एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ है, जिसमें कुछ स्थानीय लोग और जनप्रतिनिधि एक के बाद एक कैमरे के सामने यह कहते दिखाई देते हैं—
“मैं गारे पेलमा सेक्टर–1 और जिंदल का समर्थन करता/करती हूं।”
इस वीडियो ने विवाद को और गहरा कर दिया है।
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार :
वक्ताओं की भाषा, शब्द और भाव-भंगिमा बेहद यांत्रिक प्रतीत होती है
सभी का कथन लगभग एक जैसा है, जिससे यह किसी पूर्वनिर्धारित स्क्रिप्ट का हिस्सा लग रहा है
वीडियो के साथ लिखा कैप्शन— “गांव द्रोही गांव को मिटाने चल दिए”—आदिवासी समाज के भीतर बढ़ते विभाजन को दर्शाता है
आरोप है कि इस तरह के वीडियो समाज को बांटने और वास्तविक जनविरोध को कमजोर करने का माध्यम बन रहे हैं।
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दमन के आरोप : निलंबन और मुकदमे
ग्रामीणों के पोस्टरों में एक और गंभीर आरोप सामने आया है—
विरोध करने वालों पर मुकदमे दर्ज किए जाना और कुछ कर्मचारियों का निलंबन।
इससे यह आशंका गहराती है कि सहमति बनाने के लिए संवाद के बजाय भय और दबाव का सहारा लिया जा रहा है। यदि ये आरोप सही हैं, तो यह PESA कानून की लोकतांत्रिक भावना के बिल्कुल विपरीत है, जो ग्राम सभा को सर्वोच्च निर्णयकारी इकाई मानता है।
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औपचारिकता बनाम वास्तविक न्याय
तमनार का यह पूरा घटनाक्रम एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है—
क्या जनसुनवाई केवल कानून की खानापूर्ति बनकर रह गई है?
जब 14 गांव एक स्वर में कह रहे हों कि उनके साथ छल हुआ है, तब कुछ मिनटों के समर्थन वीडियो उस सामूहिक असंतोष को न तो नकार सकते हैं और न ही दबा सकते हैं।
आज गारे पेलमा में केवल कोयले की खुदाई का मुद्दा नहीं है, बल्कि लोकतंत्र, विश्वास और संवैधानिक अधिकारों की भी खुदाई हो रही है।
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सरकार और प्रशासन के सामने चुनौती
अब असली परीक्षा सरकार और प्रशासन की है—
क्या वे कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता देंगे?
या फिर संविधान प्रदत्त ग्राम सभा की संप्रभुता और आदिवासी अधिकारों की रक्षा करेंगे?
गारे पेलमा का संघर्ष आने वाले समय में यह तय करेगा कि विकास की परिभाषा केवल संसाधनों के दोहन तक सीमित रहेगी या फिर वह लोकतांत्रिक सहभागिता और सामाजिक न्याय के साथ आगे बढ़ेगी।

Anil Kumar Bhatt
Editor in Chief
