भारत की “राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने पण्डों जनजाति के वरिष्ठ सदस्य बसन्त पण्डो से मिलकर बोली “बसन्त”  आप, मेरे भी पुत्र हैं।” 73 साल पुरानी विरासत फिर हुई जीवंत

Img 20251120 Wa00064088552301137594125 1024x681


शीर्षक: राष्ट्रपति मुर्मु बोलीं—“बसन्त, आप मेरे भी पुत्र हैं”; 73 साल पुरानी विरासत फिर हुई जीवंत
स्थान: अंबिकापुर | विशेष रिपोर्ट

Img 20251120 Wa00048886613238930848739 1024x681






ऐतिहासिक और भावुक क्षण का साक्षी बना अंबिकापुर

जनजातीय गौरव दिवस के राज्य स्तरीय समारोह में गुरुवार को वह ऐतिहासिक दृश्य देखने को मिला जिसने न केवल कार्यक्रम स्थल बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के जनजातीय समाज को भावुक कर दिया। भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने पण्डो जनजाति के वरिष्ठ सदस्य बसन्त पण्डो से मिलकर जिस आत्मीयता का परिचय दिया, वह उपस्थित लोगों के लिए अविस्मरणीय बन गया।

Img 20251120 Wa000916374414980020575 1024x681



जैसे ही लगभग 80 वर्षीय बसन्त पण्डो राष्ट्रपति मंच के समीप पहुँचे, राष्ट्रपति मुर्मु ने आगे बढ़कर उनका अभिवादन किया, हालचाल पूछा और अपने हाथों से उन्हें शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया। इसी दौरान राष्ट्रपति के मुँह से निकले शब्द— “आप मेरे भी पुत्र हैं” —ने पूरे सभामंडप में भावनाओं का सैलाब ला दिया। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बसन्त पण्डो की आँखें भीग उठीं।




73 साल पुरानी विरासत फिर जीवित

बसन्त पण्डो और राष्ट्रपति के इस स्नेहिल संवाद की कहानी मात्र आज की नहीं, बल्कि 1952 में रची गई एक विरासत का पुनर्जागरण है।

Img 20251120 Wa03354222392159657288959 709x1024363550476262326690 1



साल 1952 में प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद अंबिकापुर दौरे पर आए थे। उस समय पण्डो जनजाति का 08 वर्षीय बालक गोलू (जो आगे चलकर बसन्त पण्डो कहलाए) कार्यक्रम में मौजूद था। उसकी सरलता और मासूमियत से प्रभावित होकर डॉ. प्रसाद ने उसे गोद में उठा लिया और वहीं उसका नाम बदलकर “बसन्त” रख दिया। प्रतीकात्मक रूप से उन्होंने बसन्त को अपना दत्तक पुत्र मान लिया।

यही घटना पण्डो जनजाति के लिए राष्ट्रीय पहचान का आधार बनी और समुदाय को “राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र” कहे जाने का गौरव प्राप्त हुआ।

Img 20251120 Wa00072643184448616098683 1024x639






राष्ट्रपति मुर्मु ने फिर जगाया वह गौरव

राष्ट्रपति मुर्मु द्वारा बसन्त पण्डो को “पुत्र” कहने के क्षण ने उस 73 वर्ष पुरानी स्मृति को पुनर्जीवित कर दिया। पण्डो समाज के लोगों ने इस मुलाकात को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि इससे न केवल समुदाय का मनोबल बढ़ा है, बल्कि उनकी पहचान को नया सम्मान मिला है।

समुदाय के नेताओं के अनुसार—

राष्ट्रपति के इस स्नेहपूर्ण व्यवहार से पण्डो समाज की प्रतिष्ठा राष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत हुई है।

पण्डो जनजाति के मुद्दों के समाधान की उम्मीदें बढ़ी हैं।

यह मुलाकात जनजातीय समाज की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है।





बसन्त पण्डो—सादगी का प्रतीक

अब लगभग 80 वर्ष की उम्र में भी बसन्त पण्डो वही सरल, शांत और जमीन से जुड़े व्यक्तित्व हैं। राष्ट्रपति से मुलाकात को उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा सम्मान बताया। बसन्त ने कहा कि उन्हें राष्ट्रपति मुर्मु के व्यवहार में वही अपनापन महसूस हुआ जो पहली बार 1952 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद से मिला था।




पूरा वातावरण हुआ भावुक

कार्यक्रम स्थल पर मौजूद हजारों लोग राष्ट्रपति और बसन्त पण्डो के इस मिलन के साक्षी बने। मंच पर उपस्थित जनजातीय नेता, विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधि और अधिकारी भी इस भावुक क्षण से प्रभावित हुए।
तालियों की गड़गड़ाहट और भावनाओं के उभार ने इस पल को अंबिकापुर के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिख दिया।

Img 20251120 Wa0006749656554035601743 1024x681






राष्ट्रपति के समक्ष रखीं पाँच प्रमुख मांगें

बसन्त पण्डो ने पण्डो जनजाति की उन्नति और मूलभूत समस्याओं के समाधान हेतु राष्ट्रपति के समक्ष लिखित रूप में पाँच मांगें प्रस्तुत कीं—

1. पण्डो जनजाति को केंद्र सरकार की जनजातीय सूची में शामिल किया जाए, ताकि केंद्र की सभी योजनाओं का लाभ मिल सके।


2. पण्डो जनजाति के लोगों को मिली भूमि का स्थायी पट्टा जारी किया जाए।


3. समुदाय के शिक्षित बेरोजगार युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराया जाए।


4. छत्तीसगढ़ के सभी जिलों में जहाँ पण्डो जनजाति निवासरत है, वहाँ आवासीय शिक्षा की व्यवस्था की जाए।


5. पण्डो बहुल जिलों में अस्पताल और स्वास्थ्य सुविधाएँ सुनिश्चित की जाएँ।








राष्ट्रपति मुर्मु और बसन्त पण्डो की मुलाकात न केवल एक ऐतिहासिक विरासत को पुनर्जीवित करती है, बल्कि जनजातीय समुदाय के आत्मसम्मान और पहचान को भी सशक्त करती है। अंबिकापुर का यह क्षण लंबे समय तक लोगों की स्मृतियों में जीवित रहने वाला है—एक ऐसा क्षण जिसने अतीत और वर्तमान को एक भावनात्मक धागे में पिरो दिया।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *