
छत्तीसगढ़ में तीजा-पोला की धूम: परंपरा और संस्कृति से सजा हर गांव और शहर
तिल्दा नेवरा (रायपुर) – छत्तीसगढ़ का पारंपरिक त्यौहार तीजा-पोला इस वर्ष 23 अगस्त, शनिवार से प्रारंभ हो रहा है। प्रदेश भर में इसकी तैयारियाँ जोर-शोर से चल रही हैं। हर छोटे-बड़े शहर, गांव और कस्बों में चहल-पहल देखी जा सकती है। बाजारों में मिट्टी के बने खिलौने, लकड़ी की काठी, नंदिया बैल और पारंपरिक वस्त्रों की दुकानों में भारी भीड़ उमड़ रही है।
“तीजा पोला पर्व भाद्रपद मास में मनाया जाता है। इस दिन किसान अपने बैलों को स्नान कराकर उन्हें सजाते-संवारते हैं और उनकी पूजा करते हैं।”
इस त्यौहार में बहनों को उनके भाइयों के द्वारा ससम्मान मायके (भाई के घर) बुलाया जाता है। बहनों को नये कपड़े, साड़ी, लहंगे, गहने आदि भेंट किए जाते हैं। यह सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि भाई-बहन के प्रेम का उत्सव होता है।
तीजा से पहले आता है पोला का पर्व, जिसमें विवाहित महिलाएं अपने मायके के खेल मैदान में इकट्ठा होकर बचपन की सहेलियों के साथ पारंपरिक खेल जैसे खो-खो, फुगड़ी, पिट्ठुल और झूला खेलती हैं। मिट्टी से बने पोरा को पटक कर परंपरा का निर्वहन करती हैं। बच्चे मिट्टी के बने नंदिया बैल को पुजा कर मिट्टी के बने चक्कों के सहारे बाहर चलाते है यह आयोजन न केवल परंपरा को जीवित रखता है, बल्कि बचपन की मधुर यादों को भी ताजा कर देता है।

तीजा पर्व को छत्तीसगढ़ की महिलाएं अत्यंत पवित्र और श्रद्धा से मनाती हैं। एक दिन पहले कड़वी सब्जी (जैसे करेला)भात खाकर महिलाएं अगले दिन निर्जला उपवास रखती हैं। वे अपने मायके में रहकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं और अपने पति व संतान की लंबी उम्र व सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। तीसरे दिन पूजा-पाठ और भोग अर्पण के बाद ही महिलाएं उपवास खतम करती हैं।उसके बाद अपने अपने रिस्तेदारों के घर जाकर एक दूसरे के घरों मे खाना खाने बुलाकर, एक दूसरे के घरों मे जाकर खाना खाया जाता है,जिसमे मुख्य रूप से, ठेठरी ,खुरमी,नमकीन ,बिड़िया,आदि प्रकार के वयंजनो के साथ खाना एक दूसरे को परोसा जाता है।
तीजा पोला पर्व के लिए कुम्हार समुदाय द्वारा बनाए गए मिट्टी के खिलौने – जैसे पोरा ,मिट्टी के खिलौने, नंदिया बैला आदि – बाजारों में आकर्षक रूप से सजाए गए हैं। वहीं कुछ दुकानदार अब लकड़ी से बने नंदिया बैला भी बेच रहे हैं। कुम्हार समाज परंपरा को संजोए रखने के लिए पूरी मेहनत और लागत के साथ ये मिट्टी के खिलौने तैयार कर रहे हैं।
संस्कृति से जुड़ने का पर्व है तीजा-पोरा
आज की बदलती जीवनशैली और आधुनिक सोच के बीच भी तीजा-पोला जैसे त्यौहार संस्कृति, परंपरा और पारिवारिक मूल्यों को जीवित रखने का कार्य कर रहे हैं। यह सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की आत्मा और सामाजिक एकता का प्रतीक है।
—
रिपोर्टर: अनिल कुमार भट्ट तिल्दा टाइम्स CG न्यूज

Anil Kumar Bhatt
Editor in Chief
