मांदर की थाप से गुंजा बिलाड़ी गांव, धूमधाम से मनाया गया ‘माता पहुंचनी’   पर्व 
तिल्दा-नेवरा, 07 जुलाई 2025 (सोमवार)

तिल्दा-नेवरा के समीप स्थित ग्राम बिलाड़ी में आज पारंपरिक ‘माता पहुंचनी’ कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। 

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तिल्दा टाईम्स सी जी न्यूज; संवाददाता  अनिल कुमार भट्ट



तिल्दा-नेवरा, 07 जुलाई 2025 (सोमवार):
तिल्दा-नेवरा से लगे ग्राम बिलाड़ी में आज पारंपरिक उत्साह और श्रद्धा के साथ माता पहुंचनी कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। पूरे गांव में मांदर की थाप, जसगीतों की गूंज और मातारानी के जयकारों से भक्तिमय वातावरण मे बिलाड़ी गांव गुंजायमान हो उठा।

यह आयोजन छत्तीसगढ़ की लोकपरंपराओं का एक अभिन्न हिस्सा है, जिसे विशेष रूप से आषाढ़ माह में मनाया जाता है। मान्यता है कि इस अवसर पर गांव की महिलाएं और पुरुष पारंपरिक वेशभूषा में सजकर माता की अगवानी करते हैं। मांदर की थाप पर जसगीत गाए जाते हैं और मातारानी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

भक्तों का उत्साह देखते ही बनता था।

माता पहुंचनी केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता और लोकसंस्कृति के संरक्षण का प्रतीक भी है। ग्रामीणों ने बताया कि यह पर्व पीढ़ियों से मनाया जा रहा है और इसमें पूरे गांव की सहभागिता रहती है।

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यह पर्व आषाढ़ माह में छत्तीसगढ़ की पारंपरिक संस्कृति अनुसार मनाया जाता है, जिसे विभिन्न गांवों में अपनी-अपनी मान्यताओं और विधियों के अनुरूप मनाया जाता है। बिलाड़ी गांव में यह उत्सव विशेष रूप से श्रद्धा और परंपरा का प्रतीक माना जाता है।

कार्यक्रम की शुरुआत माता सितला महामाया मंदिर में बैगा एवं ब्राह्मण गुरू द्वारा विधिवत पूजा-अर्चना से की गई। इस दौरान गांव के बड़े बुजुर्ग ,माता ,बहने बड़ी श्रद्धा से माता के चरणों मे फूल-माला, नारियल अर्पण कर माता  के  प्राप्त चरणामृत जुड़वास  हल्दी जल को श्रद्धा के साथ अपने घरो मे छिड़काव कर माता कि कृपा प्राप्त करते हैं।

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गांववासियों ने इस चरणामृत जुड़वास हल्दी जल को अपने घरों में, विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और सभी पारिवारिक सदस्यों पर छिड़काव कर  अपने घर के हर कोने—दरवाजों, कमरों, आंगनों आदि में इसका छिड़काव किया करते है मान्यता है कि इससे मातारानी की कृपा बनी रहती है, और परिवार में सुख-शांति एवं समृद्धि का वास होता है।

इस धार्मिक आयोजन ने ग्रामवासियों को एक बार फिर से अपनी मूल सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ा और लोकपरंपरा की इस अमूल्य धरोहर को संजोने का संदेश दिया।



यह पर्व छत्तीसगढ़ की आषाढ़ माह की परंपराओं में से एक प्रमुख आयोजन माना जाता है।  इस दिन गांव की कुलदेवी या ग्रामदेवी की विशेष पूजा कर उनके स्वागत और आगमन का उत्सव मनाया जाता है। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए ग्राम बिलाड़ी में भी पूरे विधि-विधान से माता रानी की अगुवाई पूजा अर्चना कर की जाती है वहीं पुरुषों और युवाओं ने मांदर और झांझ बजाकर भक्ति रस में डूबे  सेवा जसगीतों के मधुर स्वर और ताल-मांदरों की थाप ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।

ग्रामवासियों का कहना है कि माता पहुंचनी पर्व न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह गांव की एकता, समरसता और सांस्कृतिक विरासत को भी सहेजने का माध्यम है। यह पर्व सुख-समृद्धि, अच्छी वर्षा और फसल की कामना के साथ मनाया जाता है।

कार्यक्रम के अंत में सामूहिक आरती और प्रसादी वितरण का आयोजन किया गया, जिसमें गांव के सभी वर्गों के लोगों ने भाग लिया। वरिष्ठ नागरिकों और युवाओं की सहभागिता इस आयोजन को और भी भव्य बना गई।

ग्रामवासियों के अनुसार, माता पहुंचनी पर्व हर साल इसी प्रकार श्रद्धा और भक्ति से मनाया जाता है, और यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों को भी हमारी संस्कृति से जोड़ने का कार्य करती है।

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