छत्तीसगढ़ में आबकारी नीति के तहत कांच की बोतलों की जगह प्लास्टिक बोतलों में शराब बिक्री का फैसला ,छोटे कबाड़ियों की आजिविका पर संकट

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रायपुर, छत्तीसगढ़ | ग्राउंड रिपोर्ट
राज्य में Excise Department Chhattisgarh की नई आबकारी नीति के तहत कांच की बोतलों की जगह प्लास्टिक बोतलों में शराब बिक्री का फैसला जहां एक ओर प्रशासनिक और आर्थिक सुधार के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसका सीधा असर प्रदेश के हजारों छोटे कबाड़ी, ठेला व्यवसायी और ग्रामीण अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़े लोगों पर पड़ने वाला है।


छोटे कबाड़ियों की आजीविका पर संकट
Chhattisgarh के ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में लंबे समय से एक अनौपचारिक व्यवस्था चलती रही है, जिसमें खाली कांच की शराब बोतलों का संग्रहण, सफाई और पुनः उपयोग एक छोटे लेकिन स्थिर रोजगार का आधार रहा है।


गांव-गांव घूमकर बोतल इकट्ठा करने वाले कबाड़ी इन बोतलों को:
साफ करते हैं
थोक में जमा करते हैं
और फिर इन्हें शराब फैक्ट्रियों या सप्लाई चेन में वापस भेजते हैं
इस पूरी प्रक्रिया से उन्हें नियमित आय मिलती थी। अब प्लास्टिक बोतलों के आने से यह काम लगभग खत्म होने की कगार पर है।


डबलरोटी-ब्रेड बेचने वालों पर भी असर
ग्रामीण क्षेत्रों में एक खास तरह का विनिमय (बार्टर) सिस्टम भी देखने को मिलता है। डबलरोटी, ब्रेड, टोस्ट जैसे उत्पाद बेचने वाले छोटे व्यापारी अक्सर:
खाली शराब की कांच की बोतलों के बदले सामान देते थे
बाद में इन्हीं बोतलों को कबाड़ियों को बेचकर अपनी अतिरिक्त कमाई करते थे
यह व्यवस्था खासतौर पर उन इलाकों में चलती थी जहां नकद लेन-देन सीमित होता है। अब कांच की बोतलें बंद होने से यह वैकल्पिक आय का स्रोत भी खत्म हो जाएगा।


पूरी चेन पर असर


इस बदलाव का प्रभाव केवल एक वर्ग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी अनौपचारिक सप्लाई चेन प्रभावित होगी:
गांवों में बोतल इकट्ठा करने वाले
साइकिल/ठेला लेकर घूमने वाले छोटे व्यापारी
कबाड़ी दुकानदार
बोतल सफाई और पुनः उपयोग से जुड़े मजदूर
इन सभी के रोजगार पर सीधा असर पड़ेगा।


प्लास्टिक बोतल: कम मूल्य, कम उपयोग
कांच की बोतलों के विपरीत प्लास्टिक बोतलों की बाजार में पुनर्विक्रय कीमत बेहद कम होती है। साथ ही:
इन्हें दोबारा उसी रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता
इनकी सफाई और रीफिलिंग की प्रक्रिया व्यवहारिक नहीं है
इस कारण कबाड़ियों के लिए यह सामग्री आर्थिक रूप से ज्यादा उपयोगी नहीं रहेगी।


सामाजिक और आर्थिक चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे छोटे-छोटे रोजगार भले ही असंगठित हों, लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इनकी बड़ी भूमिका होती है। अचानक नीति बदलाव से इन लोगों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो सकता है।


क्या हो सकता है समाधान?
स्थिति को देखते हुए सरकार के सामने कुछ संभावित विकल्प हो सकते हैं:
प्रभावित लोगों के लिए वैकल्पिक रोजगार योजनाएं
प्लास्टिक कचरा संग्रहण और रीसाइक्लिंग में इनकी भागीदारी सुनिश्चित करना
कबाड़ी नेटवर्क को औपचारिक कचरा प्रबंधन प्रणाली से जोड़ना


निष्कर्ष:
नई आबकारी नीति जहां एक ओर सरकारी व्यवस्था को अधिक कुशल बनाने की दिशा में कदम है, वहीं दूसरी ओर इसने समाज के एक ऐसे वर्ग को प्रभावित किया है जो अब तक अनदेखा रहा है। अब जरूरत इस बात की है कि नीति के साथ-साथ इन छोटे कारोबारियों के पुनर्वास और आजीविका के विकल्पों पर भी गंभीरता से काम किया जाए।

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