
मुख्यमंत्री के गृह ज़िले से उठा बवंडर: सहायक संचालक नूतन सिदार और पत्रकार विवाद पर प्रेस की स्वतंत्रता पर बड़ा सवाल
रायपुर/रायगढ़/जशपुर | विशेष संवाददाता
छत्तीसगढ़ की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में इन दिनों एक विवाद ने भूचाल ला दिया है। जनसम्पर्क विभाग की सहायक संचालक नूतन सिदार और पत्रकार ऋषिकेश मिश्र के बीच उत्पन्न टकराव अब सिर्फ एक व्यक्तिगत विवाद नहीं रहा, बल्कि यह प्रदेश में प्रेस की स्वतंत्रता, अफसरशाही और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थिति पर गहरा प्रश्नचिह्न बनकर उभरा है।

रायगढ़ जिले के एक ग्रामीण पत्रकार ऋषिकेश मिश्र पर जनसम्पर्क विभाग की सहायक संचालक नूतन सिदार ने मानहानि और सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने का आरोप लगाते हुए रायगढ़ के पुलिस अधीक्षक को शिकायत दी है। शिकायत में उन्होंने FIR दर्ज करने, मोबाइल जब्त करने और पत्रकार की गिरफ्तारी तक की मांग की है।
नूतन सिदार का आरोप है कि पत्रकार ने उनकी तस्वीरें और कुछ संदेशों को गलत संदर्भ में वायरल कर उन्हें बदनाम किया है।
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🧭 विवाद का केंद्र: आलोचना या अफसरशाही का दबाव?
सोशल मीडिया और स्थानीय पत्रकार समुदाय में इस प्रकरण को लेकर उबाल है। सवाल यह उठ रहा है कि:
क्या एक अधिकारी अपनी आलोचना को दबाने के लिए कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग कर रही हैं?
क्या प्रशासनिक पद पर बैठे लोग अब जनता और मीडिया की आवाज़ से डरने लगे हैं?
क्या पत्रकारिता अब भयमुक्त नहीं रही?

यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण बन गया है क्योंकि जनसम्पर्क विभाग सीधे मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के अधीन है। और यह विवाद मुख्यमंत्री के गृह ज़िले से उठा है। इससे यह मुद्दा सिर्फ एक अफसर और पत्रकार की लड़ाई न होकर सीधे मुख्यमंत्री की शासन शैली और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण पर सवाल बन गया है।
👉 क्या मुख्यमंत्री के ज़िले में पत्रकारों की आवाज़ को दबाया जाएगा?
👉 क्या मुख्यमंत्री का जनसम्पर्क विभाग ही अभिव्यक्ति की आज़ादी का गला घोंटेगा?
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🗣️ पत्रकार संगठनों की तीखी प्रतिक्रिया
राज्यभर के पत्रकार संगठनों ने इस कार्रवाई की कड़ी निंदा करते हुए इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया है। उनके मुताबिक, यदि सरकार और उसके अधिकारी इस तरह से सवाल पूछने वालों पर कानूनी शिकंजा कसने लगे तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ खतरे में पड़ जाएगा।
> “यदि कलम डरने लगे, तो सच्चाई दम तोड़ देगी।”
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⚖️ नूतन सिदार की कार्यशैली पर सवाल
इस घटना ने नूतन सिदार की कार्यशैली को लेकर भी अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं:
क्या वे अपने पद की मर्यादा को भूल बैठी हैं?
क्या वह जनसम्पर्क जैसे संवेदनशील विभाग में रहकर जनता से संवाद के बजाय टकराव का रास्ता चुन रही हैं?
क्या यह सीधे तौर पर पद का दुरुपयोग नहीं है?
🧩 सोशल मीडिया पर अपराध या अभिव्यक्ति?
यह बहस भी तेज हो गई है कि क्या सोशल मीडिया पर किसी अधिकारी की आलोचना करना आईटी एक्ट के तहत अपराध है?
अगर किसी फोटो या बयान को लेकर सवाल उठाए जाएं तो क्या अधिकारी का पहला कदम पुलिस और गिरफ्तारी होनी चाहिए?
क्या ऐसे मामले बातचीत और स्पष्टीकरण से नहीं सुलझाए जा सकते?
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⚠️ विपक्ष और सामाजिक संगठनों का हमला
जैसे ही मामला सार्वजनिक हुआ, विपक्षी दलों ने इसे बड़ा मुद्दा बना लिया। कई सामाजिक संगठनों ने भी प्रशासन पर दमनकारी रवैया अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि यदि प्रेस को ही डराया जाएगा, तो शासन की पारदर्शिता का क्या मतलब रह जाएगा?
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📢 जनता के मन में उठते सवाल
1. क्या एक पत्रकार की आलोचना अब जुर्म है?
2. क्या अफसर अपनी छवि के नाम पर जनता की अभिव्यक्ति को कुचल सकते हैं?
3. क्या यह कार्रवाई वास्तव में “जनसंपर्क” की जगह “जनदमन” बनती जा रही है?
4. क्या नूतन सिदार जैसी अधिकारी लोकतांत्रिक मूल्यों को ताक पर रख रही हैं?
अब सभी की नजर रायगढ़ पुलिस की कार्रवाई पर टिकी हुई है। क्या पुलिस निष्पक्ष जांच करेगी या फिर एक अधिकारी के दबाव में पत्रकार के खिलाफ कठोर कदम उठाएगी?
यह मामला एक चेतावनी है कि लोकतंत्र में आलोचना को कुचलना खतरनाक संकेत होता है। यदि पत्रकारों की आवाज़ को दबाया जाएगा, तो सच्चाई सामने लाने वाला कोई नहीं बचेगा।
👉 अब यह मामला तय करेगा कि छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता जिंदा रहेगी या फिर अफसरशाही के साए में घुटती रहेगी।
रिपोर्ट: तिल्दा टाइम्स CG न्यूज

Anil Kumar Bhatt
Editor in Chief
