
यहां छिंदवाड़ा से सामने आई एक ह्रदयविदारक घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है। एक शिक्षक पिता और मां ने सिर्फ इस डर से कि चौथे बच्चे के जन्म से उनकी नौकरी चली जाएगी, अपने नवजात शिशु को जंगल में पत्थरों के नीचे दबाकर मरने के लिए छोड़ दिया। यह घटना न केवल समाज को शर्मसार करने वाली है, बल्कि इसने कई गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं—मानवता, संवेदनशीलता और सरकारी सेवा के नियमों को लेकर।
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छिंदवाड़ा में शिक्षक दंपती ने 3 दिन के नवजात को जंगल में पत्थर से दबाकर छोड़ा, नौकरी जाने के डर से उठाया खौफनाक कदम
जंगल में राहगीर को मिली जिंदगी की कराह
छिंदवाड़ा जिले के धनोरा चौकी अंतर्गत ग्राम नांदनवाड़ी से रविवार की रात को एक ऐसी सूचना पुलिस को मिली, जिसने हर किसी को स्तब्ध कर दिया। एक राहगीर ने पुलिस को बताया कि रोड घाट के जंगल में पत्थरों के बीच कोई आवाज आ रही है। सूचना मिलते ही चौकी प्रभारी अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे। जब पत्थरों को हटाया गया तो उनके नीचे एक 2-3 दिन का नवजात शिशु मिला।
पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए नवजात को प्राथमिक उपचार के लिए स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया, जहां से उसे बेहतर इलाज के लिए जिला चिकित्सालय रेफर कर दिया गया। गनीमत रही कि समय रहते बच्चा बचा लिया गया।
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पुलिस ने आरोपी माता-पिता को खोज निकाला
जैसे ही नवजात की जानकारी सामने आई, पुलिस ने गहन जांच शुरू की और जल्द ही उसके माता-पिता का पता लगा लिया। आरोपी दंपति की पहचान बबलू डांडोलिया और राजकुमारी डांडोलिया के रूप में हुई है, जो ग्राम सिधौली थाना तामिया के निवासी हैं, लेकिन वर्तमान में ग्राम नांदनवाड़ी में शिक्षक के रूप में कार्यरत थे।
पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया और उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 93 बीएनएस और 307 (हत्या के प्रयास) के तहत मामला दर्ज कर न्यायालय के आदेश पर जेल भेज दिया गया है।
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नौकरी जाने के डर से उठाया हैवानियत भरा कदम
पूछताछ के दौरान आरोपी शिक्षक बबलू डांडोलिया ने पुलिस को बताया कि उसके पहले से ही तीन बच्चे (8, 6 और 4 साल के) हैं। चौथे बच्चे के जन्म के बाद उसे यह भय सताने लगा कि कहीं सरकारी नियमों के अनुसार उसे नौकरी से सस्पेंड न कर दिया जाए, क्योंकि सरकारी नौकरियों में सीमित संतान नीति को लेकर कड़ी सख्तियां हैं।
इसी डर से उसने पत्नी के साथ मिलकर नवजात को जंगल में पत्थरों के नीचे दबा दिया, ताकि कोई सबूत न रहे और वह अपने रोजगार को बचा सके।
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SDOP और TI ने दी घटना की पुष्टि
अमरवाड़ा एसडीओपी कल्याणी बरकडे ने बताया कि उन्हें जैसे ही सूचना मिली, तुरंत पुलिस टीम को मौके पर रवाना किया गया। नवजात को तत्काल उपचार हेतु स्वास्थ्य केंद्र भेजा गया और फिर जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया।
वहीं, बटकाखापा थाना प्रभारी अनिल राठौर ने बताया कि आरोपी शिक्षक ने पूरी घटना स्वीकार की है और बताया कि नौकरी जाने के डर से यह निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि अब आरोपी के खिलाफ धारा 307 (हत्या का प्रयास) भी जोड़ दी गई है।
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2009 से शिक्षक, पर संवेदनहीनता चरम पर
बबलू डांडोलिया वर्ष 2009 से शिक्षक पद पर कार्यरत है। एक ऐसे पेशे से जुड़ा व्यक्ति, जिसे बच्चों की देखभाल, शिक्षा और नैतिक मूल्यों की शिक्षा देनी चाहिए, उसने खुद ही एक मासूम की जिंदगी को खतरे में डाल दिया। यह घटना न केवल एक व्यक्तिगत अपराध है, बल्कि समाज में शिक्षक जैसी जिम्मेदार भूमिका पर भी सवाल खड़े करती है।
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अब सवाल उठता है…
1. क्या नौकरी जाने का डर किसी को इस कदर हैवान बना सकता है?
2. सरकारी नौकरी में ‘दो बच्चों’ की नीति क्या मानवीय संवेदनाओं को खत्म कर रही है?
3. क्या शिक्षक जैसे पदों पर तैनात लोगों की मानसिक स्थिति की भी समय-समय पर जांच जरूरी है?
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नवजात की हालत स्थिर, समाज की संवेदनाएं जागरूक हों
फिलहाल नवजात शिशु की हालत स्थिर बताई जा रही है और वह जिला अस्पताल में इलाजरत है। वहीं समाज को भी यह घटना एक चेतावनी देती है कि किस तरह अत्यधिक दबाव और नियमों का डर एक व्यक्ति को हैवान बना सकता है।
अब समय है कि समाज, शासन और प्रशासन मिलकर यह सोचें कि मानवता को कैसे प्राथमिकता दी जाए, ताकि ऐसी दिल दहला देने वाली घटनाएं दोबारा न हो सकें।

Anil Kumar Bhatt
Editor in Chief
