
🌼 पितृपक्ष 2025: पितरों के प्रति श्रद्धा और तर्पण का 15 दिवसीय महापर्व शुरू, जानिए महत्त्व और विधि
नई दिल्ली | 08 सितंबर 2025:
हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर आश्विन अमावस्या तक चलने वाला पवित्र पर्व पितृपक्ष, जिसे संस्कृत में श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है, आज से आरंभ हो चुका है। यह पर्व पूर्वजों की आत्मा की शांति, उनके प्रति श्रद्धा व कृतज्ञता अर्पण करने का एक विशेष अवसर माना जाता है।

🔍 क्या है पितृपक्ष का महत्व?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पितृलोक के दरवाज़े पितृपक्ष के दौरान पृथ्वीवासियों के लिए खुल जाते हैं। इस काल में पितरों की आत्माएं अपने परिजनों से तर्पण, पिंडदान, और श्रद्धा की अपेक्षा करती हैं। ऐसी मान्यता है कि जो संतान इस समय विधिपूर्वक श्राद्ध करती है, उसे पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे संतान, धन, स्वास्थ्य और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
यदि किसी घर में श्राद्ध कर्म नहीं किया जाता, तो यह पितृदोष का कारण बन सकता है, जिससे जीवन में अनेक बाधाएं उत्पन्न होती हैं।

📅 पितृपक्ष 2025: तिथि और अवधि
प्रारंभ: 08 सितंबर 2025 (भाद्रपद पूर्णिमा)
समाप्ति: 22 सितंबर 2025 (आश्विन अमावस्या)
कुल अवधि: 15 दिन
हर दिन का श्राद्ध अलग-अलग तिथियों और तिथि विशेष पर मृत हुए पितरों के लिए निर्धारित होता है, जैसे त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावस्या आदि।

🕉️ विधिपूर्वक पितृपक्ष मनाने की संपूर्ण प्रक्रिया
1️⃣ पूर्व तैयारी
घर की स्वच्छता करें और पूजा स्थान तैयार करें।
गंगा जल, तिल, अक्षत, पुष्प, दीपक, पंचामृत, पितरों के नाम की सूची आदि एकत्र करें।
2️⃣ प्रथम दिन का पूजन
पूर्व दिशा में पितरों के लिए पवित्र स्थान बनाएं।
“ॐ पित्रो नमः” मंत्र के साथ दीप जलाएं, तिल अर्पित करें और ध्यान करें।
“ॐ नमो नारायणाय” मंत्र का जाप करें।
3️⃣ पिंडदान और तर्पण
तिल, चावल, जल, पुष्प और खीर से बने पिंड अर्पण करें।
पवित्र नदी में या घर के आंगन में तर्पण करें।
अमावस्या का दिन पिंडदान के लिए सबसे विशेष माना जाता है।
4️⃣ भोजन दान और ब्राह्मण सेवा
प्रतिदिन या विशेष तिथि पर ब्राह्मणों को भोजन कराना, गायों को चारा देना और निर्धनों को अन्न व वस्त्र दान करना शुभ होता है।
5️⃣ व्रत और संयम
कई श्रद्धालु व्रत रखते हैं और सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं।
इस दौरान मांसाहार, नशीले पदार्थों, और तामसिक भोजन से परहेज करना चाहिए।

🌾 तिल और जल का महत्व
शास्त्रों के अनुसार, तिल का उपयोग पाप शमन के लिए किया जाता है। पितृपक्ष में तिल मिश्रित जल से तर्पण करना आत्मा को शांति प्रदान करता है। इसी प्रकार, जलदान का भी विशेष महत्त्व है, जिससे पितृ लोक में शीतलता प्राप्त होती है।
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📜 विशेष सावधानियां
श्राद्ध कर्म हमेशा शुद्धता और विधिपूर्वक किया जाना चाहिए।
ब्राह्मणों को आमंत्रित कर ससम्मान भोजन कराना चाहिए।
तर्पण करते समय पितरों के नाम, गोत्र और तिथि का सही उच्चारण आवश्यक है।
इस काल में कोई भी शुभ कार्य जैसे विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश आदि वर्जित माने जाते हैं।
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🧘 पितृपक्ष का समापन
पितृपक्ष का अंतिम दिन यानी अमावस्या को विशेष श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य करके इस पर्व का समापन किया जाता है। कई स्थानों पर सामूहिक पिंडदान और ब्राह्मण भोज का आयोजन किया जाता है।
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🌸 निष्कर्ष: पितरों की प्रसन्नता से आता है जीवन में सुख
पितृपक्ष का पर्व भारतीय संस्कृति में “ऋण” चुकाने की परंपरा से जुड़ा है। माता-पिता और पूर्वजों के ऋण से कोई मुक्त नहीं हो सकता, लेकिन श्रद्धा और तर्पण के माध्यम से हम उनकी आत्मा को तृप्त करके आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। यह पर्व न केवल आध्यात्मिक संतुलन लाता है, बल्कि परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और उत्तम संतान की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
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🕯️ इस पितृपक्ष, पूर्वजों को करें स्मरण, करें विधिपूर्वक श्राद्ध – और पाएं जीवन में शुभता का संचार।
🙏🏻 श्रद्धेय पितरों को शत् शत् नमन।
तिल्दा टाइम्स CG न्यूज संवाददाता अनिल कुमार भट्ट

Anil Kumar Bhatt
Editor in Chief
