जशपुर में ‘जनसंपर्क’ का नया मॉडल ,प्रशासनिक कार्यशैली, प्रेस  की स्वतंत्रता और जनसम्पर्क विभाग की भूमिका पर सवाल 

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बिग ब्रेकिंग | विशेष रिपोर्ट
जशपुर में “जनसंपर्क” का नया मॉडल
खबर छापो तो ‘अपराधी’, सवाल पूछो तो ‘1 करोड़’ का नोटिस!


रायपुर/जशपुर/घरघोड़ा।
छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक कार्यशैली, प्रेस की स्वतंत्रता और जनसंपर्क विभाग की भूमिका—तीनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जनसंपर्क (Public Relations) का अर्थ अब तक सरकार और जनता/प्रेस के बीच संवाद और पारदर्शिता माना जाता था, लेकिन जशपुर में इसका एक “नया मॉडल” देखने को मिल रहा है—जहाँ खबर लिखना अपराध और सवाल पूछना मानहानि बनता नजर आ रहा है।

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इस पूरे प्रकरण के केंद्र में हैं जिला जनसंपर्क कार्यालय की सहायक संचालक और पत्रकार ऋषिकेश मिश्रा, जिन्होंने विभाग के एक कर्मचारी द्वारा प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या का प्रयास किए जाने की खबर प्रकाशित की थी। इसी खबर के बाद विवाद ने तूल पकड़ लिया।


क्या है पूरा मामला?


जानकारी के अनुसार, जिला जनसंपर्क कार्यालय में पदस्थ कर्मचारी रविंद्रनाथ राम ने 20 अगस्त को थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कथित तौर पर कार्यालय में प्रताड़ना और मानसिक दबाव का उल्लेख था।


इसके बाद 2 सितंबर को पत्रकार ऋषिकेश मिश्रा ने इस मामले को खबर के रूप में प्रकाशित किया।
यहीं से विवाद की शुरुआत हुई।


“सच लिखना” बना अपराध?


पत्रकार द्वारा खबर प्रकाशित किए जाने के बाद आरोप है कि जनसंपर्क विभाग की सहायक संचालक ने बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के, सरकारी व्हाट्सएप ग्रुप में पत्रकार को “अपराधी” करार दे दिया।

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इस व्हाट्सएप ग्रुप में जिले के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी—कलेक्टर, एसपी सहित अन्य जिम्मेदार अधिकारी भी जुड़े बताए जाते हैं।


कानूनी जानकारों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को “अपराधी” घोषित करने का अधिकार केवल न्यायालय को होता है, न कि किसी अधिकारी या विभाग को। ऐसे में सरकारी मंच पर इस तरह की टिप्पणी पद के दुरुपयोग और मानहानि के दायरे में आती है।


व्हाट्सएप बना “अदालत”?


परिवाद में आरोप है कि खबर छपते ही सहायक संचालक ने जज, जूरी और जल्लाद—तीनों की भूमिका खुद ही निभा ली।


न तो किसी जांच का इंतजार किया गया, न ही किसी स्पष्टीकरण की मांग। सीधे-सीधे सरकारी ग्रुप में पत्रकार की छवि धूमिल करने की कोशिश की गई।


यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सरकारी व्हाट्सएप ग्रुप अब न्यायालय की जगह ले चुके हैं? और क्या प्रशासनिक पद पर बैठे अधिकारी कानून से ऊपर हो गए हैं?


एक करोड़ रुपये का मानहानि नोटिस


मामले ने तब और गंभीर मोड़ ले लिया, जब पत्रकार ऋषिकेश मिश्रा को 1 करोड़ रुपये का मानहानि नोटिस भेजा गया।


आरोप है कि यह नोटिस खबर से आहत होकर नहीं, बल्कि पत्रकार को डराने और चुप कराने के उद्देश्य से भेजा गया।
पत्रकार ने नोटिस का विधिवत जवाब दिया है, लेकिन यह सवाल अब भी कायम है कि—


क्या सरकारी पद पर बैठकर पत्रकारों को डराना अब “जनसंपर्क” का हिस्सा बन गया है?
सिस्टम की चुप्पी, पत्रकार अदालत में
पत्रकार ऋषिकेश मिश्रा ने इस मामले में पुलिस अधीक्षक से लेकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक को शिकायत भेजी।


लेकिन आरोप है कि किसी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।


न जांच बैठी, न ही संबंधित अधिकारी से जवाब-तलब किया गया।


आखिरकार, थक-हारकर पत्रकार ने घरघोड़ा न्यायालय में परिवाद दायर किया है।

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परिवाद में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 और भारतीय न्याय संहिता 2023 की धाराओं—308, 356, 352, 351—के तहत कार्रवाई की मांग की गई है।


“कलम बनाम अहंकार” की लड़ाई


यह मामला अब सिर्फ एक पत्रकार और एक अधिकारी के बीच का विवाद नहीं रह गया है।


यह प्रेस की स्वतंत्रता बनाम सत्ता के अहंकार की लड़ाई बनता जा रहा है।


पत्रकारिता का काम सवाल पूछना और सच सामने लाना है, न कि सत्ता के आगे नतमस्तक होना।


जैसा कि कहा जाता है—पत्रकार “चरणचुंबक” नहीं, बल्कि आईना होते हैं। आईना तोड़ने से चेहरा सुंदर नहीं हो जाता।


वरिष्ठ पत्रकार कुमार जितेन्द्र का तीखा बयान


जिला जनसंपर्क कार्यालय से जुड़े इस मानहानि प्रकरण पर वरिष्ठ पत्रकार कुमार जितेन्द्र ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है।
उन्होंने इसे बेहद गंभीर और खतरनाक प्रवृत्ति बताया।


कुमार जितेन्द्र ने कहा—


“इस तरह के मामलों को हल्के में लेना या टालना बेहद ख़तरनाक है। इससे सत्ता और पद का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों का मनोबल और बढ़ जाता है।”

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उन्होंने आगे कहा—


“एक पत्रकार नोटिस और मानहानि तक तो किसी तरह झेल लेता है, लेकिन इससे आगे बढ़कर षड्यंत्र रचते हुए झूठे आरोप लगाकर कई पत्रकारों को जेल भिजवाया जा चुका है। यह प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है।”


वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार, यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे पत्रकार समुदाय के सम्मान और अधिकारों से जुड़ा हुआ है।


“इस प्रकरण को नजीर बनाना ज़रूरी है, ताकि हर अधिकारी यह समझ सके कि वह जनता का नौकर है, मालिक नहीं। सत्ता का घमंड लोकतंत्र और पत्रकारिता—दोनों के लिए घातक है।”


उन्होंने न्यायालय और प्रशासन से अपेक्षा जताई कि मामले में कठोर और समयबद्ध कार्रवाई हो, ताकि भविष्य में कोई भी अधिकारी पद और ताकत के बल पर पत्रकारों को डराने या बदनाम करने का साहस न कर सके।


बड़ा सवाल


अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या जशपुर प्रशासन को यह समझने के लिए ट्यूशन लेनी पड़ेगी कि “आलोचना” और “अपराध” में फर्क होता है?
न्यायालय में चल रही इस कानूनी लड़ाई पर पूरे प्रदेश के पत्रकारों और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले नागरिकों की नजरें टिकी हैं।


क्योंकि आज अगर एक पत्रकार को सच लिखने की सजा मिलती है, तो कल सवाल पूछने की हिम्मत कौन करेगा?

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