सत्ता के अहंकार का हिंसक चेहरा :छत्तीसगढ़ जनसम्पर्क  कार्यालय में मारपीट का मामला ,असल दोषी कौन ?

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यह मुद्दा संवेदनशील, बहु-आयामी और लोकतंत्र के स्तंभों — प्रेस, प्रशासन, और कानून-व्यवस्था — के आपसी टकराव का उदाहरण है।

सत्ता के अहंकार का हिंसक चेहरा: छत्तीसगढ़ जनसंपर्क कार्यालय में मारपीट — दोषी कौन?

रायपुर | विशेष रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ के जनसंपर्क संचालनालय में हुई मारपीट की घटना इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर पत्रकारिता जगत और जनमानस के बीच गंभीर बहस का विषय बनी हुई है। जहां एक ओर प्रतिष्ठित अख़बारों और चैनलों की हेडलाइंस इस घटना को “पत्रकारिता के नाम पर गुंडागर्दी” कहकर प्रचारित कर रही हैं, वहीं सामने आया वीडियो और खुद एफआईआर में दर्ज विवरण मीडिया की इन सुर्खियों पर कई सवाल खड़े कर रहा है।

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क्या हुआ जनसंपर्क कार्यालय में?

एक वायरल वीडियो के अनुसार, एक पत्रकार (काले शर्ट में) शांतिपूर्वक जनसंपर्क कार्यालय में स्थित अपर संचालक संजीव तिवारी के कक्ष में प्रवेश करता है और बात करता दिखता है। वीडियो में न तो कोई धमकी, न ही कोई गाली-गलौज या शारीरिक आक्रामकता प्रारंभ में दिखाई नही देती है।

लेकिन अचानक ही संजीव तिवारी अपनी कुर्सी से उठकर पत्रकार का गर्दन पकड़ते हैं, फिर दूसरे व्यक्ति (पतले-दुबले युवक) को गला दबाकर धकेलते हैं। अपने साथी की रक्षा में पत्रकार केवल कुछ क्षणों के लिए तिवारी को पकड़ता है, और जैसे ही उसका साथी छूटता है, वह भी पीछे हट जाता है।

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एफआईआर: बयान और वास्तविकता

दर्ज एफआईआर में खुद संजीव तिवारी ने लिखा है कि “मैं अपने सीट से उठकर उन्हें कक्ष से बाहर निकालने की कोशिश की…” — जो वीडियो से मेल खाता है।

एफआईआर के अनुसार:

चार अज्ञात लोगों द्वारा कक्ष में अनाधिकृत प्रवेश किया गया।

अभद्रता और गाली-गलौज की बात कही गई, पर किसी “हमले” का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।

संजीव तिवारी ने मनोज पांडे (पत्रकार) पर सीधे कोई आरोप नहीं लगाया।

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फिर पुलिसिया कार्रवाई मनोज पांडे पर क्यों?

10 अक्टूबर 2025 की रात, पुलिस बिना वारंट के रात 1:37 बजे मनोज पांडे के घर में जबरन घुसी, CCTV DVR उठाकर ले गई और कथित तौर पर घर में मौजूद महिलाओं से अभद्रता भी की। सवाल यह उठता है कि:

1. जब एफआईआर “चार अज्ञात व्यक्तियों” पर थी, तो पुलिस को किस आधार पर पांडे के घर दबिश दी गई?


2. कोई भी धारा 7 वर्ष से अधिक सजा योग्य नहीं थी, तो रात में छापा क्यों?


3. क्या पुलिस के पास वारंट था?


4. महिला पुलिसकर्मी क्यों नहीं थीं?


5. क्या यह सिर्फ पत्रकारिता का प्रतिशोध था?



कानूनी दृष्टिकोण से पुलिस की कार्रवाई कितनी वैध?

भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धाराएं 165, 166A, 452 और 354 के अनुसार:

बिना वारंट रात में तलाशी लेना केवल आपात स्थिति में संभव है।

किसी महिला के घर में प्रवेश पर महिला पुलिसकर्मी का होना अनिवार्य है।

DVR जब्त करना बिना उचित प्रक्रिया के सबूत नष्ट करने की मंशा भी दर्शा सकता है।


यह स्पष्ट रूप से सुप्रीम कोर्ट के D.K. Basu बनाम पश्चिम बंगाल फैसले की गाइडलाइंस का उल्लंघन है।




संजीव तिवारी: शक्ति का दुरुपयोग?

संजीव तिवारी छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग में दो दशक से एक ही पद पर जमे हुए हैं। पत्रकार मनोज पांडे ने अपने समाचार माध्यम में इसी विषय पर रिपोर्टिंग की थी। क्या यह हमले का प्रतिशोध था?

यदि संजीव तिवारी ने किसी को शारीरिक रूप से मारा, अपमानित किया, तो उनके खिलाफ भी ये धाराएं बनती हैं:

धारा 323 – चोट पहुँचाना

धारा 352 – बिना उकसावे के हाथापाई

धारा 504 – अपमान करना

धारा 166 – पद का दुरुपयोग

धारा 307 – जान से मारने का प्रयास (यदि गला दबाने की मंशा सिद्ध होती है)





मीडिया का पक्षपात?

जब वायरल वीडियो और एफआईआर की वास्तविकता अलग कहानी बयां कर रहे हैं, तब मीडिया संस्थानों का केवल चुनिंदा फुटेज चलाना, केवल पत्रकारों को दोषी ठहराना — क्या यह प्रायोजित पत्रकारिता का संकेत नहीं?

विज्ञापन प्राप्त करने वाले कॉरपोरेट मीडिया घराने क्या जनसंपर्क विभाग की नाराज़गी से बचने के लिए सच्चाई को दबा रहे हैं?




क्या पत्रकार ब्लैकमेलर हैं?

सरकारी तंत्र और प्रशासनिक अफसरों द्वारा यह धारणा बार-बार फैलाई जाती है कि “आजकल के पत्रकार ब्लैकमेलर हैं।” पर क्या यही बात भ्रष्ट अधिकारियों पर लागू नहीं होती?

सवाल यह नहीं कि कौन पत्रकार है और कौन अधिकारी — सवाल है कि सच्चाई किसके साथ है?




निष्कर्ष: क्या कानून सबके लिए समान है?

यदि एक पत्रकार ने कोई अपराध किया है, तो उसे कानून सज़ा दे — लेकिन क्या एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी द्वारा की गई मारपीट, गला दबाने और पद के दुरुपयोग को नजरअंदाज किया जा सकता है?

यदि पुलिस खुद कानून तोड़े, महिलाओं के अधिकारों का हनन करे, तो उसके खिलाफ कौन कार्रवाई करेगा?




समाज को सवाल पूछना होगा:

क्या सत्ता और सिस्टम के खिलाफ सवाल पूछना अपराध है?

क्या सच्चाई की रिपोर्टिंग करने वाला पत्रकार असुरक्षित है?

क्या अफसरशाही कानून से ऊपर है?

क्या पुलिस तंत्र सत्ता का हथियार बन गया है?





लेखक: विशेष संवाददाता
स्रोत: अकील अहमद अंसारी की फेसबुक पोस्ट, वायरल वीडियो, दर्ज एफआईआर और कानूनी दस्तावेज।

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